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Best Hindi Story With Moral | महान वैद्यराज के महानता की कहानी

Best Hindi Story With Moral | महान वैद्यराज के महानता की कहानी

Best Hindi Story With Moral | महान वैद्यराज के महानता की कहानी

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इस Best Hindi Moral Story में आप सब आज एक वैद्यराज की बहुत ही बेहतरीन रोचक कहानी सुनने को मिलेगी। इस कहानी में वैद्यराज के पूरे जीवन की कहानी को विस्तार से जानेंगे।


तो चलिये दोस्तों इस best hindi moral story को शुरू करते हैं।


वैद्यराज त्रिलोचन पंडित त्रिलोचन शर्मा की कहानी | Best Hindi Story


एक बहुत ही महान वैद्यराज थे। उनका नाम पंडित त्रिलोचन शर्मा था, उनका आयुर्वेद का बहुत अच्छा ज्ञान था। आयुर्वेद के लगभग सारे महत्वपूर्ण ग्रन्थ उनको पूरी तरह से याद था। नाड़ी- ज्ञान भी उनका अदभुत था। भयंकर-से-भयंकर रोग से पीड़ित आदमी को किसी भी रोग की सही पहचान कर लेते थे। इसलिए उनसे चिकित्सा कराने वाला प्रत्येक व्यक्ति निरोग होकर ही लौटता था।


उन्हें अपने इस महाज्ञान का बिल्कुल भी घमंड नहीं था। क्या राजा,क्या रंक,क्या धनी, क्या निर्धन वे अपने सभी रोगियों से बिना भेदभाव किये सबके साथ प्रेमपूर्वक व्यवहार किया करते थे। उनको न तो किसी धनी व्यक्ति से लालच और न गरीबों से घृणा थी। उनके उत्तम व्यवहार ने उन्हें देश भर में प्रसिद्ध कर दिया। चारो तरफ उनकी ख्याति फैल गई।


फिर क्या था, देश के कोने-कोने से रोगी उनके पास पहुंच कर स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करने लगे।


विवाह को वैद्यराज जी इन सब कामों में बाधक मानते थे। अतः उसके झमेले में वे न पड़े थे। वह स्वयं तथा उनके दो शिष्य- यहीं उनका परिवार था। वे दिन भर रोग पीड़ितों की सेवा, सुश्रुषा एवं चिकित्सा ही उनका दैनिक कार्य था।


उनका यहीं कार्यक्रम चलता रहा। यहाँ तक कि उनके चेहरे से यौवन का तेज भी घटने लगा। बाल सफेद होने लगे तथा शरीर पर झुर्रियां भी पड़ने लगी। ये सभी लक्षण उनके बुढापे का स्पष्ट संकेत दे रहे थे।


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एक दिन उन्होंने अपने दोनों प्रिय शिष्यों से कहा- "मेरे प्रिय पुत्रों! मैं अपना समस्त ज्ञान और अपने समूचे जीवन का अनुभव तुमको सौंप चुका हूँ। तुमदोनों ही सुयोग्य बैद्य बन चुके हो।"


दोनों शिष्यों ने एक साथ कहा- ये सब आपकी कृपा से हुआ है गुरुजी। आप न होते तो हम बिल्कुल अनाथ होते।


"अपने शिष्यों की बात सुनकर वैद्यराज के चेहरे पर मुस्कान फैल गयी। वे मुस्कुराते हुए बोले- "वत्स, मेरा शरीर अब वृद्धावस्था में प्रवेश करने लगा है। मैं अब अपनी इस कुटिया को छोड़कर देश-विदेश की यात्रा करके प्रकृति के विराट रूप का दर्शन करना चाहता हूँ।"


दोनों शिष्यों में से एक शिष्य ने बड़ी करुणापूर्वक होकर पूछा- "गुरुजी आप वापस कब लौटोगे?"

"गुरुजी बोले- इतना तो मैं नहीं बता सकता।"


"क्या....,नहीं गुरुवर! ऐसा नहीं हो सकता। यदि आपका ऐसा विचार है, तो हम आपको रोकेंगे तो नहीं, किंतु आपके साथ हम स्वयं भी चलेंगे।"

"नहीं वत्स! मैं अकेला ही जाऊंगा।"


शिष्य लोग इस बात को अच्छी तरह से जानते थे कि उनके गुरुजी निश्चय पर दृढ़ रहने वाले व्यक्ति है। इसलिए वे उदास होकर बोले- गुरुवर! अब तक तो आपने हमें समर्थ बनाने में ही कष्ट उठाया है। आपको अपनी सेवा से हम कुछ सुखी रख सकें, वह समय अब आया था कि अभी आपने हमें छोड़ने का निर्णय ले लिया।" ये कहकर दोनों शिष्य बच्चों की तरह रोने- बिलखने लगे।


वैद्य जी अपने शिष्यों को समझा बुझाकर शांत किया और बोले-" जनसेवा से कभी विमुक्त मत होना और घृणा तथा चापलूसी से बचकर चलना। बस यही, मेरा उपदेश है।"

दोनों शिष्यों ने परम श्रद्धाभाव से चरण स्पर्श करके गुरुजी को विदाई दी।


गुरुजी यात्रा के लिए चल पड़े। सदा सबके साथ भाईचारे का  भाव रखने वाले गुरुजी के लिए सभी अपने थे। अतः यात्रा की कठिनाई भी उन्हें दुखी न बना सकी। सदैव प्रसन्न रहना, जहाँ दिन खत्म होने लगे वही कहीं उचित जगह देख कर विश्राम कर लेना और रूखा- सूखा जो भी कुछ मिल जाये, वही आनन्दपुर्वक खा लेना। यही उनकी दिनचर्या बन चुकी थी। 


उनकी यात्रा चलती रही- चलती रही। देश के सभी प्रमुख पावन तीर्थों का दर्शन किये, सभी नदियों व सरोवरों में स्नान किये और सबसे अधिक महत्वपूर्ण कार्य यह किया कि मार्ग में यदि कोई रोग से पीड़ित व्यक्ति मिलता तो उसे रोगमुक्त भी करते रहे। पूर्व से पश्चिम उत्तर से दक्षिण तक, पद यात्रा से उन्होंने पूरे देश का भर्मण किया।


इस बीच उनका सुंदर और मोटा ताजा शरीर सूखकर हड्डियों का ढांचा मात्र रह गया और बुढापे ने भी उनके शरीर पर पूरी तरह अधिकार कर लिया। फिर भी उनका उमंग और उत्साह में जरा भी परिवर्तन नहीं आया था।


एक दिन घनघोर जंगल में ही दिन ढल गया और रात हो गयी। वे रात बसेरे की खोज करते हुए एक झोपड़ी पर पहुंचे। उन्होंने उस झोपड़ी को साधु संत की कुटिया समझ लिया था। अतः उसके द्वार पर जाकर दरवाजे को खटखटाया। द्वार खुलने पर एक भयंकर आकर की चुड़ैल उसमें से निकली। 

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एक साधु द्वारा अपने द्वार पर खड़ा  देखकर मन ही मन प्रसन्न होकर सोचने लगी- "मैं बीमारी के कारण अधिक दुर्बल हो चुकी हूं, भोजन की तलाश में झोपड़ी से निकल नहीं सकती आज ईश्वर ने घर बैठे-बैठे आठ-दस दिन का भोजन भेज दिया है।"


वह चुड़ैल अपने स्वर में मिश्री घोलकर बोली- "पंडितजी आप मेरे घर में रात बसेरा करना चाहते हैं न?"


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उस भयंकर औरत की मधुर वाणी सुनी यो पंडितजी आश्चर्यचकित होकर मन ही मन सोचने लगे- वाह रे प्रभु! भयंकर पहाड़ के बीच अमृत सरीखें मधुर जल का झरना!...फिर उस औरत से बोले-"बहिन! आपकी वाणी जितनी मधुर है, उससे भी अधिक आप कमजोर और रोगपीडित लगती हो। आप पर किसी रोग ने आक्रमण किया है क्या ?"


"हाँ- अजनबी साधु! मुझे कोढ़ हो गया है... पर इससे क्या, मेरे कर्मों का फल तो मुझे मिलना ही था। मैं चुड़ैल हूँ। मैंने अपने जीवन मे बहुत से  भले आदमियों को अपना भोजन बनाया है। आखिर उस पाप का घड़ा एक दिन तो फूटना ही था।" ये कहते- कहते उस चुड़ैल का गला भर आया और उसके आंखों से झर-झर आंसू गिरने लगे।


"दुखी मत हो बहन! रोग अभी पहले चरण में ही है, ईश्वर ने चाहा तो मेरी दवा से आपका रोग आठ दिन में ही गायब हो जाएगा।" ये कहकर पंडितजी उल्टे पैरों लौट पड़े और एक जड़ी लेकर थोड़ी देर में पुनः लौट  कर झोपड़ी पर आ पहुँचे। पंडितजी ने स्वयं अपने हाथ से ही उस औषधि का रस निकालकर उस चुड़ैल को पिलाया और कोढ़ से गलने वाले अंगों पर दवा का लेप किया।


दवा जादू के जैसे अपना काम किया  महीनों तक पीड़ित रहने वाली चुड़ैल दवा सेवन के कुछ देर बाद ही मीठी नींद में सो गयी।


आठ दिन के बजाय जब चुड़ैल चार दिन में ही पूरी तरह से स्वस्थ हो गयी तो उस रात वह पंडितजी से बोली- "भैया, आपने मेरा खोया हुआ स्वास्थ्य वापस मुझे लौटा दिया है, इसलिए मेरा भी कर्तव्य हो जाता है कि मैं आपका कुछ उपकार करूँ।"


"आपकी कृपा से बहन, मुझे कुछ नहीं चाहिए।"

पंडितजी ने आश्चर्य से चौंकते हुए बोला- "तो क्या आप मुझे फिर से नौजवान बना देगा ?"


"युवा ही नहीं, बिल्कुल बालक बना दूंगी।"

"क्या मतलब ?"

"मतलब मैं चुड़ैल हूँ। मैं आपको सुबह ही खा जाऊंगी फिर आप दुबारा जन्म लेकर बालक बन जाओगे। हा... हा...." भयंकर हंसी हँसकर वह चुड़ैल बोली।


पंडितजी विद्वान तो थे ही, स्थिति की विकटता समझकर उन्होंने मन-ही-मन बचाव का उपाय सोच लिया और मुस्कुरा कर बोले-'बहन, यह तो सचमुच आपका मुझपर उपकार होगा। मुझे कल नहीं, आज ही खा डालो। किन्तु"

"किन्तु क्या.....मरने से डर गये न ?"


बिल्कुल नहीं, किन्तु मरने से पहले मैं यह अमर- बूटी किसी भले आदमी को खिलाना चाहता हूँ।" ये कहकर उन्होंने अपने झोले से एक बूटी निकालकर चुड़ैल के हाथ पर रख दिया।

चुड़ैल ने अपने हाथ में बूटी लेते ही खा गई और गहरी नींद में सो गई। दूसरे दिन प्रातःकाल ही वैद्यराज अपने यात्रा पर चल पड़े।


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उसी दिन उन्हें एक साधु की कुटिया पर रात गुजारनी पड़ी। उस कुटिया वाले साधु ने जब अपनी तरह के ही एक जटाधारी को देखा तो अत्यंत प्यारपूर्वक उसे ठहराया। फिर गांजा रगड़कर उसकी चिलम तैयार करके पंडितजी को देने लगा।


पंडितजी बोले- "भैया, मैं किसी भी प्रकार का धूम्रपान नहीं करता हूँ।"

'तो ये क्यों नहीं कहते कि तुम साधु नहीं हो। साधु के वेष में कोई और हो। चिलम लगाता हुआ वह साधु बड़बड़ाया-'भला सच्चा साधु भगवान शिव के प्रसाद का निरादर कैसे कर सकता है ?'


वैद्यराज समझ गये कि साधु समझाने से नहीं मानेगा। उन्होंने अपनी झोली में से एक जड़ी निकालकर उस साधु को देते हुए कहा- "यह है भगवान शिव का असली गांजा, अपनी चिलम में पलटकर इसकी चिलम बनाओ।


नशेबाज आदमी तो रोज नए-नए नशा की ताक में रहते हैं, साधु अपनी चिलम पलटकर वैद्यराज की बूटी से चिलम तैयार किया और जय शंकर बम...बम...बम का जोरदार उद्घोष करके लम्बा कश खिंचा। सचमुच उस साधु ने अपने जीवन कभी ऐसा गांजा नहीं पिया था। एक कश से ही उसे नशा छाने लगा और थोड़ी ही देर में जहाँ था वहीं सो गया।


वह साधु सूर्योदय तक गहरी नींद में सोता रहा। जब तक वैद्यराज जी स्नान ध्यान करके अपनी यात्रा को शुरू करने के लिए तैयार हो चुके थे। उन्होंने पानी की छींटे मारकर उस साधु को जगाया।


जगाते ही साधु, वैद्यराज के चरणों में मस्तक खा कर गिर गया और बोला- 'महाराज, 40 साल के बाद ऐसी सुखद निंद आयी है, अन्यथा मेरी रातें तो चिलम फूंकते और खांसते-खांसते बीत गया है।


वैद्यराज ने प्रेमपूर्वक कहा- जागो अब सबेरा हो गया है। अब तुम्हे कभी किसी नशा की इच्छा नहीं होगी। साधु को भजन का नशा ही काफी है। अच्छा अब जय शंकर की, अब मैं चलूंगा। ये कहकर वैद्यराज जी वहाँ से चल दिये।


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उसके अगले दिन उनका पड़ाव एक गांव में वैद्यराज गंगदेव के यहाँ हुआ। बातचीत करते करते जब गंगदेव ने जान लिया  कि उसके अतिथि साधु कोई और नहीं, प्रसिद्ध वैद्यराज पंडित त्रिलोचन शर्मा है, तो उनके हर्ष का ठिकाना नहीं रहा।


रात भी गंगदेव ने पंडितजी के अनुभव की पिटारी से महत्वपूर्ण रत्न प्राप्त किये और सबेरा होने पर जब पंडितजी ने विदाई चाही तो गंगदेव ने उनके चरण पकड़कर अत्यंत विनीत वाणी में बोला- श्रद्धेय! अपने पुत्र को आपका शिष्य बनाने की मेरी प्रबल लालसा है।


"बन्धु! मेरा कोई ठिकाना नहीं है, और ना ही मैं अब चिकित्सा का कार्य करता हूँ। संयोग से मेरी यात्रा के दैरान कोई रोगी मिल जाये तो उसको औषधि दे दूं, ये अलग बात है।


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'मेरे पुत्र के लिए आपका आशीर्वाद इतना ही काफी है कि आप उसे कम-से-कम एक वर्ष तक अपने साथ रखें।'

'यात्रा में अनेक प्रकार के कष्ट उठाने पड़ते हैं, बच्चे की सुकुमार देह उन कष्टों को भला कैसे सह पाएगी ?'

'पूज्यवर! लगनपूर्वक की गई प्रार्थना कभी बेकार नहीं जाती, फिर आप जैसे विद्वान के साथ की गई प्रार्थना तो सोने में सुगंध होगी। मेरी आपसे बारम्बार प्रार्थना है कि आप मेरे पुत्र को ले ही जाये।'


पंडितजी को गंगदेव की प्रार्थना स्वीकार करनी पड़ी। वे उनके बिस वर्षीय पुत्र को अपने साथ लेकर चल पड़े। गंगदेव का पुत्र बहुत ही तीव्र बुद्धि का था। उसे आयुर्वेद के प्रमुख ग्रँथों का ज्ञान पहले से ही था। अतः वह पंडितजी के जी का जंजाल न बनकर उनका सहायक सिद्ध हुआ। वह खूब मन लगाकर गुरुजी की सेवा करता था।


जब किसी भी गुरुजी को मन पसन्द शिष्य मिल जाता है तो वह अपनी सारी ज्ञान की पिटारी खोलकर शिष्य के सामने रख देता है। अतः वह केवल छः महीने के यात्रा में ही उसे सभी गोपनीय जड़ी-बूटियों की जानकारी पंडितजी ने उसे करा दी। दुर्लभ और दिव्य औषधियों का ज्ञान प्राप्त करके शिष्य को उसके खुशी का ठिकाना का ओर-छोर न था।


एक दिन तेज दोपहर में पंडितजी एक बड़े वृक्ष के छाया में बैठे भगवान के नाम का स्मरण कर रहे थे और उनका शिष्य सूर्यकांत भूख शांत करने के लिए किसी कन्दमूल की खोज में गया था।


तभी वहाँ एक राजकुमार आया। अपने घोड़े को एक पेड़ के नीचे बांधकर उस राजकुमार ने बगीचे में चारों तरफ नजर दौड़ाई तो उसे एक पेड़ के नीचे तपस्वी साधु बैठा दिखाई दिया। वह तेज कदमों से साधु के पास पहुंचा और उनके चरण छू कर प्रणाम किया।

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पंडितजी ने आशीर्वाद देते हुए कहा-'सुखी रहो बेटा! कहीं के राजकुमार लगते हो।'

राजपुत्र तो हूँ महाराज! किन्तु पिताश्री के असाध्य रोगों के कारण सुखी नहीं हूँ। उनके रोग की चिकित्सा तो खूब हो चुकी है, किन्तु उसका कोई लाभ नहीं हुआ। अब तो मैं किसी ऐसे साधु-संत की खोज में दो माह से भटक रहा हूँ, जो अपने आशीर्वाद या झाड़-फूँक से उनका स्वास्थ्य लौटा सके। भले ही इस काम के लिए कोई हमारा आधा राज्य ले लें।


'क्या रोग है, आपके पिताश्री को ?' वैद्यराज ने पूछा।
'रोग ने उनकी वाणी छीन ली है। सुखदायक पलंगों को त्याग कर वे धरती पर रहना पसंद करते हैं।'

'अच्छा! उनके चिकित्सा की जानकारी है ?'
'एक चिकित्सा हुई हो तो जानकारी रखी जाए! लगभग पचास नामी वैद्यों ने अपने-अपने ढंग से अलग अलग चिकित्सा की है।'


'दुखी और निराश मत हो वत्स! आपके पिताजी अवश्य ठीक होंगे।'

'आपको यंत्र, मंत्र, तंत्र में से किस विद्या की जानकारी है प्रभो! 'आतुरता से राजकुमार ने पूछा।
'आपके पिताजी को स्वस्थ करने वाली विद्या की जानकारी है। बस, यही समझो।'
"महाराज! तब तो आपसे मेरी प्रार्थना है कि आप मेरे साथ राजधानी पधारने की कृपा करें।"
  'आपकी राजधानी कितनी दूर है, राजपुत्र ?'
  'आप इस बात की चिंता न करें, मैं अपने घोड़े पर आपको ले चलूंगा।'
  'मेरे साथ मेरा एक शिष्य भी है।'
  'कहाँ है, आपका शिष्य ?'


तभी कन्दमूल लेकर सूर्यकांत आ पहुंचा, तो वैद्यराज ने राजकुमार से उसका परिचय कराया। फिर सूर्यकांत से कहा- ' बेटे! यह जंगल तरह-तरह की जड़ी बूटियों से भरा पड़ा है, तुम दो दिन तक जड़ी बूटियों का अध्ययन करना, मैं तीसरे दिन तुमसे यहीं पर आकर मिलूंगा।'


सूर्यकांत ने सिर झुकाकर गुरुजी की आज्ञा स्वीकार की, तो वैद्यराज राजकुमार के साथ चल पड़े।

इधर पूरी राजधानी शोक में डूबा हुआ देखकर राजकुमार का कलेजा कांप उठा। फिर भी वह चुपचाप राजमहल जा पहुंचा। वहाँ पर एक सेवक ने सूचना दी-'राजकुमार! अभी कुछ क्षण पहले ही महाराज हमें बिलखता हुआ छोड़कर परलोक सिधार गए हैं।


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यह सुनकर राजकुमार की आँखों में आंसू तैर आये, किन्तु वैद्यराज ने कहा-' मैं महाराज की मृतक शरीर को देखना चाहता हूँ।'

वैद्यराज ने नाड़ी देखी तो उन्हें राजा के शरीर में जीवन के लक्षण दिखाई दिए। उन्होंने तुरंत राजा को कृत्रिम ढंग से सांस देने की प्रक्रिया शुरू कर दी। और जब कुछ क्षणों के प्रयास के बाद ही राजा ने आँखे खोल दी तो शोकमग्न वातावरण, खुशी से झूम उठा। सब लोगों ने वैद्यराज की जय जयकार करने लगे।


वैद्यराज प्रशंसा के भूखी नहीं थे। लोगों की बातों पर ध्यान न देकर वे अध्ययन करते रहे। अपनी विलक्षण बुद्धि से लगभग एक घण्टा तक विचारने के बाद उन्हें रोग का भेद मिल गया। वे प्रसन्न हो उठे। राजा को एक उचित औषधि की खुराक देकर उन्होंने राजकुमार से कहा- राजपुत्र! मैंने रोग को पहचान लिया है, ईश्वर ने चाहा तो  महाराज आज शाम तक पूर्ण रूप से स्वस्थ हो जायेंगे।'


वैद्यराज हम सब आपकी कैसे आभार प्रकट करें!'
इसकी जरूरत नहीं है! हाँ नगर के बाहर किसी साधु-संत के आश्रम में मैं रात बसेरा करना चाहूंगा। मुझे किसी ऐसे ही स्थान पर भेज दो।

राजा के बगीचे में ही सुंदर आश्रम था। अतः वैद्यराज जी को वही पर भेज दिया गया।

अमोध औषधि ने ऐसा चमत्कार कि राजा सचमुच एक दिन में ही ठीक हो गए।


जब राजा ने अपने होने की पूरी बात सुनी तो राजा दूसरे दिन साधारण वस्त्र पहनकर, पैदल चलकर वह बगीचे में पहुंचे और वैद्यराज के चरणों में अपना मस्तक टिका कर कहा-"प्रभो, मेरे पुत्र ने मुझे स्वस्थ कर देने वाले को आधा राज्य देने की घोषणा की थी। मेरी प्रार्थना है कि आप मेरा आधा राज्य स्वीकार करें।'


वैद्यराज हंस कर बोले- 'चिकित्सा तो पूरी रोग की किया है, फिर आधा राज्य क्यों ?'
ये सुनते ही राजा सकपका गया तो पंडितजी बोले-'मुझे कुछ नहीं चाहिए, बन्धु! आपलोग सुखी रहो! प्रजा को सुखी बनाने के लिए प्रयत्नशील रहो! परमात्मा आपका कल्याण करें!!!


राजा बोला- 'महाराज, आपको कुछ तो स्वीकार करना होगा ?
अच्छा राजन! यदि देना ही चाहते हो तो मुझे दस वर्ष का जीवन दे दो, ताकि मैं घूम- घूमकर प्रकृति के अनोखे रूप का दर्शन कर सकूँ।'

महाराज! मैं भला आपका जीवन कैसे बढ़ा सकता हूँ? राजा बोले।
   'तो मोक्ष ही दे दो।'


महाराज क्षमा करें। मैं आपका व्यंग्य समझ गया हूँ। जो आप चाहेंगे, वह मैं नहीं दे सकता और जो मैं आपको देना चाहता हूँ, उसकी आपको चाह नहीं। फिर भी कुछ, सेवा का अवसर तो मुझे दीजिये।


राजा की यह बात सुनकर तो पंडितजी कुछ सोचने लगे। कुछ देर बाद उन्होंने राजा से पूछा-'यहाँ राजवैद कौन है ?

राजा ने गहरा सांस लेकर कहा- 'लगभग तीन वर्ष पूर्व उनका देहावसान हो गया। अब वह पड़ रिक्त है।'

'अच्छा! तब मैं अपने शिष्य सूर्यकांत को वह पद दिए जाने का अनुरोध करता हूँ। वह चिकित्सा ज्ञान में पारंगत है।'

'आपकी आज्ञा शिरोधार्य, देव! यह तो हमारा सौभाग्य है। आप बताइये, वे कहां निवास करते हैं, मैं आज ही उन्हें सादर बुलवाने का प्रबंध करता हूँ।


तब वैद्यराज ने बताया कि किस प्रकार सूर्यकांत को साथ लेकर उसके पिता के पास पहुँचना है और उनकी स्वीकृति मिल जाने पर ही उसे राजवैद्य का पद देना है। फिर वैद्यराज वहाँ से अपने आगे की यात्रा पर निकल पड़े।
गुरु की महिमा को सुनकर सूर्यकांत बोल उठा- धन्य हो गुरु ! आप जैसा गुरु पाकर मैं धन्य हो गया।


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इस Hindi Story से हमें यहीं सिख मिलती है कि ज्ञान किसी पहचान की मोहताज नहीं होती। अगर आपके पास किसी चीज़ का ज्ञान है तो बिना किसी भेदभाव के सेवा में लगे रहिये समय पर आपको उसका फल जरूर मिल जाएगा।


साथियों ये Hindi story हमें ये भी सिख देती है कि गुरु की सेवा सच्चे मन से करना चाहिए। अगर आप अपने गुरु का सम्मान करेंगे तो गुरु आपका हमेशा भला ही करेगा। गुरु कभी अपने शिष्यों का बुरा नहीं चाहता है।


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धन्यवाद।


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