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दो अनसुनी धार्मिक कहानियां जो आप नहीं जानते होंगे | धर्म ग्रँथों की कहानियां

दो अनसुनी धार्मिक कहानियां जो आप नहीं जानते होंगे | धर्म ग्रँथों की कहानियां

Best 2 Hindu Mythological Stories In Hindi | दो अनसुनी पौराणिक और रहस्यमयी धार्मिक कहानियां


मित्रों आज हम ऐसे दो अनसुनी धार्मिक कहानियां जानेंगे जो इससे पहले शायद आपने कभी नहीं सुना होगा। हम धीरे-धीरे अपनी पुरानी संस्कृति को भूल रहे हैं जो काफी गलत है। हमारी संस्कृति कल भी उतनी ही अच्छी थी जितनी कि आज। 


अपनी हिन्दू संस्कृति को ही बढ़ावा देने के क्रम में हम आपके लिए ये दोनों पुरानी रहस्यमयी पौराणिक कथाएं लेकर आये हैं जो काफी रोचक और धार्मिक है। तो चलिए बिना किसी देरी के इन दोनों अनसुनी धार्मिक ग्रँथों की कहानियों के बारे में जानते हैं।


भगवान शिव जी की पौराणिक रहस्यमयी कथा | Unknown Short Stories Of Hindu Mythology In Hindi

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भगवान शिव जी की अनसुनी कथा

देवों के देव महादेव को क्यों घड़ियाल बनना पड़ा? शर्वशक्तिमान महादेव को क्यों एक तुच्छ प्राणी का रूप लेना पड़ा? सृष्टि के सृजनकर्ता और संहारक जिनका ना ही आदि है और ना ही कोई अंत। भोलेनाथ, शम्भूनाथ, महादेव जैसे दर्जनों नाम वाले महादेव के साथ ऐसा क्यों हुआ जो उन्हें मगरमच्छ का रूप लेकर पानी में जाना पड़ा?


तो आइए जानते हैं भगवान शिव जी की रहस्यमयी पौराणिक कथा के इस रोचक तथ्य के बारे में विस्तार से जानते हैं।


पौराणिक कथाओं के अनुसार देवों के देव महादेव एक बार पर्वत पर तपस्या में लीन थे। तभी देवतागण मिलकर अचानक से उनकी प्रार्थना करने लगे। देवतागण माता पार्वती की अनुसंशा को लेकर उनसे प्रार्थना कर रहे थे। महादेव ने देवताओं की प्रार्थना तो स्वीकार कर लिया। लेकिन विजय के गम्भीरता को देखते हुए वो स्वयं इसका उपाय ढूंढने में लग गए। तो क्या थी वो कथा जिसको लेकर देवतागण को महादेव से प्रार्थना करनी पड़ी। चलिये उसके बारे में विस्तार से जानते हैं।


पौराणिक कथाओं के अनुसार माता पार्वती महादेव से शादी करने के लिए दृढ़ निश्चय कर चुकी थी। वो सबकुछ त्याग कर घोर तपस्या में जुट गई थी। सालों साल तपस्या में लीन पार्वती की ये दशा देखकर देवता द्रवित हो गए और महादेव से उनकी आराधना को पूर्ण करने की प्रार्थना करने लगे।


महादेव ने देवताओं की प्रार्थना तो स्वीकार कर ली लेकिन अब उनके सामने एक बहुत बड़ी समस्या आ खड़ी हो गयी थी कि वो माता पार्वती के बारे में कैसे पता लगाएं? भगवान स्वयं किस प्रकार से माता पार्वती के सामने जाते? ऐसा करने पर माता पार्वती नाराज भी तो हो सकती थी।


वो इसी सोच में डूबे थे कि तभी उन्हें एक उपाय सुझा। महादेव ने सप्तऋषियों को माता पार्वती की परीक्षा लेने के लिए भेजा। सप्तऋषियों ने महादेव से शादी करने के फैसले के बारे में माता पार्वती जी से पूछा। परन्त फिर भी पार्वती महादेव का गुणगान करते नहीं थक रही थी।


उन्होंने कहा कि वो सर्वगुण सम्पन्न और शक्तिमान है। उनमें ही सारी सृष्टि समायी हुई है। फिर सप्तऋषियों ने महादेव के सैकड़ों अवगुण गिनवाए। परन्त देवी पार्वती अपने फैसले से जरा भी पीछे नहीं हटी और अपने फैसले पर अटल रहते हुए उन्होंने कहा कि महादेव के अलावा वो किसी और से विवाह करना उन्हें मंजूर नहीं है।


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इसके पश्चात सप्तऋषि वहाँ से लौट आये और पूरी कहानी महादेव को बताई। जिसके बाद उन्होंने स्वयं पार्वती जी की परीक्षा लेने को ठानी। जैसा कि हम सब जानते हैं कि शादी से पहले सभी वर अपने भावी अर्धांगिनी को लेकर सभी सन्देहों को दूर करना चाहते हैं।


इसमें महादेव भी पीछे नहीं रहे। ऐसे में उन्होंने स्वयं पार्वती जी की परीक्षा लेने की योजना बनाई। उधर माता पार्वती जी एक तलाब के किनारे अपनी तपस्या में लीन थी। तभी तलाब के किनारे एक बालक को एक मगरमच्छ ने पकड़ लिया। अपनी जान को खतरे में देखकर बालक शोर मचाने लगा। वो जोर-जोर से मगरमच्छ-मगरमच्छ चिलाकर अपनी जान बचाने के लिए किसी से सहायता मांगने लगा।


पार्वती जी ने जब किसी बच्चे की चीख पुकार सुनी तो उनसे रहा नहीं गया और वो तपस्या छोड़कर उसे बचाने के लिए तलाब के किनारे पहुंच गई। वहाँ उन्होंने देखा कि मगरमच्छ ने एक बालक को पकड़ा हुआ है और वो उसे तलाब में खींचकर अंदर ले जाने की कोशिश कर रहा है।


बालक देवी को देखकर उनसे अपनी जान बचाने के लिए विनती करने लगा और बच्चा कहने लगा- हे माता! मेरी जान को खतरा है। यदि आप चाहेंगी तो मेरी जान बच सकती है। वैसे भी ना तो मेरी माता है और ना ही पिता। अब आप ही मेरी रक्षा कीजिये। मुझे बचाइए माता।


देवी पार्वती से बच्चे की पुकार सुनकर रहा नहीं गया और उन्होंने मगरमच्छ से कहा- हे मगरमच्छ! इस निर्दोष बालक को छोड़ दीजिए बदले आपको जो चाहिए वो आप मुझसे मांग सकते हैं। जिसके पश्चात मगरमच्छ ने कहा कि एक शर्त पर मैं इसे छोड़ सकता हूँ। आपने तपस्या करके महादेव से जो वरदान प्राप्त किया है, यदि उस तपस्या का फल आप मुझे दे देगी तो मैं इसे छोड़ दूंगी।


पार्वती जी मगरमच्छ के इस शर्त को मान लिया और कहा- लेकिन आपको इस बालक को शीघ्र ही छोड़ना होगा। मगरमच्छ ने देवी को समझाते हुए कहा कि अपने इस फैसले पर फिर से विचार कर लीजिए। जल्दबाजी में आकर कोई वचन न दीजिये क्योंकि आपने हजारों वर्षों तक जिस प्रकार से तपस्या की है वो देवताओं के लिए भी असम्भव है। उसका सारा फल इस बालक के प्राणों के लिए मत गंवाइए।


फिर पार्वती जी ने कहा- मैं फैसला कर चुकी हूं। मेरा इरादा अटल है, मैं आपको अपनी तपस्या का पूरा फल देने को तैयार हूँ परन्तु आप इसे तुरंत मुक्त कर दीजिए। मगरमच्छ ने पार्वती जी से अपनी तपस्या दान करने का वचन ले लिया और जैसे ही पार्वती जी ने अपनी तपस्या का दान किया मगरमच्छ का शरीर तेज से चमकने लगा।


फिर मगरमच्छ ने कहा- देखिये आपके तपस्या के तेज से मेरा शरीर कितना चमकने लगा है। फिर भी मैं आपको अपनी भुल सुधारने का एक मौका और देता हूँ। इसके उत्तर में पार्वती जी ने कहा कि तपस्या तो मैं फिर से कर सकती हूँ लेकिन यदि आप इस निगल जाते तो क्या इसका जीवन वापस मिल पाता?


इस पर मगरमच्छ ने कुछ जवाब नहीं दिया और इधर-उधर देखने लगा। इसी क्रम में देखते ही देखते वो लड़का और मगरमच्छ दोनों अदृश्य हो गए। पार्वती जी को इस पर आश्चर्य हुआ कि ऐसा कैसे हो सकता है कि दोनों एक साथ अचानक से गायब हो गए।


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लेकिन पार्वती जी ने इस पर अधिक ध्यान नहीं दिया और इस बात पर विचार करने लगी कि उन्होंने अपनी तपस्या का फल तो दान कर दिया पर फिर से इसे कैसे प्राप्त किया जाए? इसके लिए उन्होंने फिर से तपस्या करने का प्रण किया। वो तपस्या करने के लिए तैयारियां करने लगी कि अचानक महादेव उनके सामने अचानक प्रकट हो गए और वो कहने लगे कि हे देवी भला अब तपस्या क्यों कर रही हो?


पार्वती जी ने कहा- हे प्रभु! आपको अपने स्वामी के रूप में पाने के लिए मैंने संकल्प लिया है लेकिन मैंने अपनी तपस्या का फल दान कर दिया है। ऐसे में मैं फिर से वैसे ही घोर तपस्या करके आपको प्रसन्न करना चाहती हूँ। इसके जवाब में महादेव ने कहा कि हे पार्वती! अभी आपने जिस मगरमच्छ को अपनी तपस्या का फल दिया और जिस लड़के की जान बचाई इन दोनों रूपों में मैं ही था।


अनेक रूपों में दिखने वाला मैं एक ही हूँ, मैं अनेक शरीरों में शरीर से अलग निर्विकार हूँ। यह मेरी ही लीला थी। मैं यह देखना चाहता था कि आपका मन प्राणी मात्र में सुख-दुःख का अनुभव करता है कि नहीं। इस पर पार्वती जी ने कहा- हे प्रभु! क्या मैं आपकी परीक्षा में सफल हुई तो महादेव ने उत्तर दिया- हे देवी! आप प्राणियों का सुख-दुःख समझती है, आपमें दया और करुणा दोनों है।


अब आपको और तपस्या करने की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि आपने अपनी तपस्या का फल मुझे ही दिया है। ये सुनकर माता पार्वती अति प्रसन्न हुई और इसके बाद माता पार्वती और भगवान महादेव का विवाह हो गया। तो देखा आपने कि भगवान शिव क्यों घड़ियाल बनें?


अब आप हमें कमेंट करके जरूर बताएं कि क्या इससे पहले इस भगवान शिव की रहस्यमयी पौराणिक कथा के बारे में जानते थे? साथ ही आपको ये short devotional stories in hindi कैसी लगी ये भी जरूर बतायें।


महाभारत के विदुर की अनसुनी कहानी | Short Religious Stories In Hindi With Moral

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महात्मा विदुर की कहानी

मित्रों इस indian mythological stories in hindi में आप महाभारत के विदुर की अनसुनी कहानी के बारे में जानेंगे कि अगर विदुर महाभारत में युद्ध करते तो क्या होता? तो चलिए इस अनसुनी पौराणिक कथाओं के बारे में जानते हैं।


जैसा कि हम जानते हैं कि महाभारत धर्म और अधर्म का युद्ध था। पांडवों और कौरवों दोनों ही पक्ष में बहुत ही शक्तिशाली योद्धा थे। जैसे अर्जुन, भीम, भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य, कर्ण और इन शक्ति से भी परे स्वयं भगवान कृष्ण। कृष्ण की शक्ति की तो कोई तुलना भी नहीं की जा सकती।


परन्तु महाभारत में अन्य सभी शक्तिशाली योद्धाओं से भी शक्तिशाली एक योद्धा थे। जिन्हें हम सब महात्मा विदुर के नाम से जानते हैं। ऐसा कहा जाता है कि विदुर धर्मराज के अवतार थे और यदि वे चाहते तो महाभारत युद्ध में अपने धनुष से पूरी सेना को एक ही पल में नष्ट कर सकते थे।


परन्तु ये सम्भव नहीं हो सका। तो आइए हम जानते हैं कि महात्मा विदुर के इतना शक्तिशाली होने के बाद भी विदुर महाभारत युद्ध को क्यों समाप्त नहीं कर पाए?


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साथियों विदुर धृतराष्ट्र और पांडु के भाई होने के साथ-साथ कौरवों और पांडवों के काका भी थे। हस्तिनापुर के नरेश शान्तनु और उनकी पत्नी माता सत्यवती के दो पुत्र हुये। जिनके नाम चित्रांगद और विचित्र वीर्य थे। दोनों पुत्रों के बचपन में ही शान्तनु का देहांत हो गया जिससे चित्रांगद और विचित्र वीर्य का पालन भीष्म पितामह के द्वारा किया गया।


यदि आप शान्तनु और भीष्म पितामह के बारे में नहीं जानते हैं तो  हम आपको बता दें कि भीष्म शान्तनु की प्रथम पत्नी गंगा से उत्पन्न हुए थे। शान्तनु ने सत्यवती के सुदरता पर मोहित होकर उनसे विवाह कर लिया। परन्तु विवाह से पूर्व सत्यवती के पिता ने एक शर्त रखी थी कि शान्तनु के पश्चात सत्यवती से उत्पन्न पुत्र ही राजा का पद ग्रहण करेगा न कि उनकी पहली पत्नी गंगा का पुत्र।


शान्तनु के वचन दिया और इसके बाद उनका विवाह माता सत्यवती से हो गयी। इस कारण अपने पिता का वचन रखने के लिए भीष्म आजीवन कुँवारे रहे और चित्रांगद तथा विचित्र वीर्य का अपने बच्चों के समान पालन पोषण किया। चित्रांगद के बड़े होने पर भीष्म पितामह ने उन्हें सिंहासन सौंप दिया।


कुछ समय पश्चात ही गन्धर्वों के साथ हुए युद्ध में चित्रांगद की मृत्यु हो गयी। अब विचित्र वीर्य भी युवावस्था में थे तो भीष्म ने उनका विवाह करने का विचार किया। उसी समय काशीराज की तीन पुत्रियां- अम्बा, अम्बे और अम्बालिका का स्वयंम्बर होने वाला था। भीष्म ने वहाँ जाकर सभी राजाओं को परास्त किया और तीनों कन्याओं का हरण कर लिया। उसके बाद अपने साथ उन्हें हस्तिनापुर लेकर आ गए।


इस पर अम्बा ने भीष्म से कहा कि वो राजा शाल्व से प्रेम करती है और उनसे ही विवाह करना चाहती है। ये सुनकर भीष्म ने अम्बा को राजा शाल्व के पास भिजवा दिया। लेकिन अन्य दोनों कन्याओं का विवाह विचित्र वीर्य के साथ करवा दिया।


कुछ समय के पश्चात ही विचित्र वीर्य को क्षय रोग हो गया और उनकी अचानक मृत्यु हो गयी। तब तक उनकी कोई भी संतान उत्पन्न नहीं हुई थी। वंश खत्म होने के भय से माता सत्यवती ने भीष्म से कहा कि वो विचित्र वीर्य की पत्नियों से पुत्र उत्पन्न करें।


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परन्तु भीष्म पितामह ने अपनी प्रतिज्ञा तोड़ने से मना कर दिया। तब सत्यवती ने अपने एक और पुत्र वेद व्यास को स्मरण किया। साथियों वेदव्यास सत्यवती और ऋषि परासर के ही पुत्र थे। वेदव्यास अपने माँ की आज्ञा का पालन करते हुए पुत्र उत्पत्ति के लिए तैयार हो गए। उन्होंने अम्बा और अम्बालिका से एक वर्ष तक नियम व्रत का पालन करने के लिए कहा।


फिर एक वर्ष पश्चात उन्होंने माँ सत्यवती से कहा कि अम्बिका और अम्बालिका को एक-एक करके निर्वस्त्र होकर उनके सामने से गुजरना होगा। परन्तु लज्जा के कारण दोनों संकोच करने लगी। सत्यवती के समझाने पर अम्बिका और अम्बालिका ऐसा करने के लिए सहमत हो गयी।


फिर एक वर्ष पश्चात जब वेदव्यास अम्बिका का पास गए तब अम्बिका ने डर से अपने तेज नेत्र बंद कर लिए। कक्ष से बाहर आने पर वेदव्यास ने माता सत्यवती से कहा कि अम्बिका को बहुत ही तेजस्वी पुत्र प्राप्त होगा। परन्त उसने अपने नेत्र बंद कर लिए इसलिए ये पुत्र नेत्रहीन होगा।


ये सुनकर माता सत्यवती को बहुत ही दुःख हुआ। इसके पश्चात वेदव्यास छोटी रानी अम्बालिका के पास गए। वेदव्यास के डरावने रूप को देखकर अम्बालिका बहुत डर गई। जिसके बाद वेदव्यास ने माता सत्यवती से कहा कि अम्बालिका का पुत्र पांडु रोग से ग्रसित होगा।


ये सुनकर माता सत्यवती को और भी दुःख हुआ और उन्होंने अम्बालिका को पुनः वेदव्यास के सामने जाने के लिए कहा। इस बार अम्बालिका ने खुद न जाकर अपनी दासी को वेदव्यास के सामने भेज दिया। दासी उनके सामने जाकर बिल्कुल नहीं घबराई।


तब वेदव्यास जी ने माता सत्यवती से कहा कि इस दासी से उत्पन्न हुआ पुत्र नीतिवान और वेदों का महाज्ञानी होगा। आपको बता दें कि अम्बिका से उत्पन्न हुआ पुत्र ही धृतराष्ट्र, अम्बालिका से उत्पन्न हुआ पुत्र पांडु और दासी से उत्पन्न हुआ पुत्र ही विदुर था।


ऋषि मांडव्य के श्राप के कारण यमराज ने दासी पुत्र के रूप में जन्म लिया और वे आगे चलकर धृतराष्ट्र के मंत्री बनें। विदुर स्वयं धर्म का पालन करते थे और चाहते थे कि धृतराष्ट्र भी धर्म के मार्ग पर चलें। परन्तु दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं हो सका। जब भी धृतराष्ट्र पांडवों के हिट की बात करते तब विदुर उन्हें समझाने का प्रयास करते।


पांडवों के प्रति स्नेह देख दुर्योधन उनसे ईर्ष्या करता था। लाक्षागृह के षड्यंत्र में भी विदुर ने उन्हें आगाह किया था और उन्हें इनसे बचने की भी युक्ति बताई थी। विदुर के पास बहुत ही शक्तिशाली और चमत्कारी धनुष था जो उन्हें स्वयं भगवान श्रीकृष्ण से प्राप्त हुआ था।


इस धनुष से वे चाहते थे तो वे युद्ध को एक ही पल में समाप्त कर सकते थे। एक बार विदुर ने दुर्योधन को पांडवों से युद्ध न करने की सलाह भी दी थी। ये सुनकर दुर्योधन बहुत क्रोधित हो गया और विदुर को अपशब्द कहना शुरू कर दिया। ये सुनकर विदुर ने अपना धनुष तोड़ दिया और युद्ध नहीं लड़ेंगे। उन्हें भलीभाँति ज्ञान था कि यदि वे महाभारत युद्ध का हिस्सा बनेंगे तो उन्हें कौरवों की तरफ से युद्ध करना होगा।


अर्थात अधर्म के पक्ष में युद्ध करना होगा। इसीलिए उन्होंने स्वयं युद्ध न करने का निश्चय किया। साथ ही उन्होंने धृतराष्ट्र को समझाया भी दुर्योधन उनका पूरा खनदान खत्म कर देगा। परंतु विदुर की बात किसी ने नहीं मानी और इसका परिणाम क्या हुआ इससे तो हम सभी अवगत ही है। साथियों महाभारत के विदुर की ये पुरानी रहस्यमयी कहानी कैसी लगी हमें कमेंट करके जरूर बतायें।


Conclusion Of Hindu Mythology Stories In Hindi


इन दोनों धार्मिक कहानियों के बारे में बताने का हमारा यहीं मकसद था ताकि हम अपनी संस्कृति को याद कर सकें। ये ऐसी कहानी है जो हमें हमारे धर्म से जोड़े रहती है। ऐसी कहानियों को पढ़ने का सबसे बड़ा फायदा ये है कि हमें ये मानसिक तनाव से मुक्ति दिलाती है और सही मार्ग ओर चलना सिखाती है।


हम उम्मीद करते हैं कि आपको ये best hindu short mythological stories in hindi काफी अच्छी लगी होगी। अगर आपको हमारा ये पुरानी रहस्यमयी पौराणिक कथाएं अच्छी लगी हो तो इसे शेयर जरूर करें।

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