Bhagat Singh Biography In Hindi | खून खौला देने वाली भगत सिंह की कहानी

Bhagat Singh Biography In Hindi | राष्ट्रपुत्र भगत सिंह का जीवन परिचय

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Bhagat Singh Biography


Bhagat Singh (भगत सिंह) Biography In Hindi: आज हम बात करेंगे अमर शहीद भगत सिंह की जीवनी के बारे में। एक ऐसे योद्धा की जो मर कर भी अपना नाम हमेशा के लिए अमर कर गये। एक ऐसे वीर योद्धा जिन्होंने इतनी कम उम्र में ही अपनी भारत माँ के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।


एक ऐसे योद्धा जिनके चलते अंग्रेजों के आँखों से नींद गायब हो गया था। एक ऐसे योद्धा जिसके लिए अंग्रेजों के बनाये अपने ही कानून को मजबूरन तोड़ना पड़ा।


जी हाँ ऐसे थे हमारे भगत सिंह। उन्होंने अपने बहादुरी से अपना नाम इतिहास के सुनहरे पन्नों पर दर्ज करा कर चले गए। लेकिन जाते-जाते भगत सिंह हमें वो चीज़ सीखा गए जो शायद आज तक हमें कोई नहीं सीखा पाया वो ये था कि ” जियें तो जिये कैसे और मरे तो मरे कैसे।”


भगत सिंह ने हमें ये सिखाया कि जिंदगी जितने दिन जियो अपनी मातृभूमि के लिए जियो और अगर मरना भी पड़े तो मातृभूमि के लिए मरो। क्या हम भगत सिंह को वो सम्मान दे पाये जिसके वो हकदार थे ?


आज हम भगत सिंह के हक लिए बात करना चाहते हैं। क्या भगत सिंह को आतंकवादी कहना गलत नहीं है, क्या उनको शहीद का दर्जा न देना उनका अपमान नहीं है?


अगर आपको भी ये बात बुरी लगती है तो भगत सिंह की जीवनी को पूरा पढ़िए और उनकर बारे में पूरी विस्तार से जानते हैं कि कैसे उन्होंने अपनी ज़िंदगी अपने देश के लिए कुर्बान कर दिया उसके बदले हमने उनके साथ क्या किया?


Bhagat Singh Full Life Story In Hindi| भगत सिंह की पूरी जीवनी

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भगत सिंह की जीवनी


ये बात है तब की जब भारत और पाकिस्तान का बंटवारा नहीं हुआ था यानी भारत और पाकिस्तान एक ही देश हुआ करता था। जिसे अंग्रेजों ने अपना गुलाम बनाया हुआ था। उस समय भगत सिंह का जन्म 28 सिंतबर 1907 को पंजाब प्रांत के जिला लायलपुर के बंगा गांव में हुआ था। जो कि अब पाकिस्तान का हिस्सा है।


भगत सिंह के पिता का नाम सरदार किशन सिंह और माता का नाम विद्यावती कौर था। भगत सिंह के पिता और चाचा एक सक्रिय स्वतंत्रता सेनानी थे। उनके परिवार के सभी लोग बड़े वीर और साहसी थे। दोस्तों भगत सिंह भी बचपन से ही बहुत निडर और साहसी थे। उनके हिम्मत को देखकर उनसे बड़े उम्र के लड़के भी आश्चर्यचकित हो जाते थे।


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भगत सिंह की शिक्षा (Bhagat Singh Education)


बचपन से ही भगत सिंह के मन में अंग्रेजों के प्रति नफरत भर गई थी। उस समय लाहौर में एक स्कूल था जो ब्रिटिश हुकूमत का था। उन्होंने उस स्कूल में अपना एडमिशन नहीं लिया।


आर्य समाज के माहौल में दयानंद एंग्लो पद्दति के द्वारा भगत सिंह अपनी शिक्षा आरंभ किया। जिसको आज हमलोग DAV(डीएवी)) के नाम से जानते हैं। शुरू से ही ये पढ़ाई में इतना तेज थे कि बचपन में ही इन्होंने 50 किताबें पढ़ डाली जो कि इनके स्कूल से अलग किताबें थी।


भगत सिंह में जो एकाकी की भावना थी न उससे हम सबको सीखना चाहिए। हर जगह वो उठते-बैठते नहीं थे। उस समय  हर जगह केवल आजादी की ही बात हो रही थी। इनके भी मन में आजादी की भावना जाग उठी।


भगत सिंह का क्रांतिकारी जीवन | Bhagat Singh Full History In Hindi


भगत सिंह जब छोटे थे उस समय 13 अप्रैल 1919 को इतिहास का सबसे क्रूर नरसंहार पंजाब के अमृतसर में जलियावाला बाग हत्याकांड हुआ था। जनरल डायर ने रॉलेट एक्ट के विरोध में हो रही सभा में बिना किसी चेतावनी के भीड़ में खड़ी निहत्थे लोंगो पर गोलियां चलवा दी थी। आंकड़े के अनुसार 1000 से भी ज्यादा लोग मारे गए।


इस घटना के पश्चात पूरे भारत में उस समय अंग्रेजों के प्रति आक्रोश फैल गया। भगत सिंह को जब ये पता चला तो वो 40 किलोमीटर दूर पैदल ही चलकर पहुँच वहाँ गए। वहाँ पहुँचकर उन्होंने जो देखा वो बहुत दर्दनाक था। इतने लाशें बिछी हुई थी।


बहुत लोग तो जनरल डायर की गोलियों से बचने के लिए पास के कुएं में कुद कर अपनी जान गवां दिया। कहते हैं आज भी उस कुएं से पानी निकालो तो रक्त की बूंदे मिलती है।


भगत सिंह वहाँ से खून से गीली मिट्टी को अपने घर लाये और घर मे लाकर अकेले सुन्न पड़ गए। उनके बहन ने पूछा क्या हुआ तो भगत सिंह ने जवाब दिया ‘ये खून मेरे उन शहीदों का है जिनका बदला मैं जरूर लूंगा। अंग्रेजो को अपने देश से मार भगाऊंगा।’


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जब ये छोटे थे तो उनके पिता जी एक बार खेतों में आम का बीज बो रहे थे,तो भगत सिंह ने पूछा पिताजी ये क्या बो रहे हैं? पिताजी ने कहा- बेटा आम का पेड़ लगा रहा हूँ बड़ा होगा तो ये फल देगा। उन्होंने कहा पिताजी फिर क्यों न हम बन्दूक बोये की ये बन्दूकों का पेड़ लग जाये। जो अंग्रेजो को भगाने के काम आएगा।


1 अगस्त 1920 को जब महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन शुरू किया था। जिसके अनुसार उन्होंने कहा था कि कोई भी नागरिक ब्रिटिश सरकार का साथ न दें। हर लोग अपनी नौकरियां छोड़ दे, मजदूर फैक्टरियों में काम न करें, बच्चे सरकारी स्कूलों में न जाये, कोई किसी तरह का टैक्स न दें, सारे विदेशी सामानों को जला दो।


इसके पीछे उनका मतलब था कि अगर सारे लोग एक साथ ब्रिटिश सरकार का बहिष्कार करेंगे तो उनका काम रुक जाएगा तो वो एक साल के अंदर भारत छोड़कर चले जायेंगे। 


भगत सिंह के परिवार के लोग भी महात्मा गांधी के इस विचार से सहमत थे। वो भी  ही इस आंदोलन का भी समर्थन कर रहे थे। भगत सिंह भी इतनी छोटी उम्र में ही महात्मा गांधी के इस असहयोग आंदोलन से जुड़ गए और बढ़-चढ़ कर उसमें हिस्सा लिया।


5 फरवरी 1922 को गोरखपुर जिले के चौरीचौरा नामक स्थान पर अंग्रेजो ने एक शांतिपूर्ण जुलूस को रोकना चाहा। वे लोग मांग कर रहे थे कि अंग्रेजों वापस जाओ, अपने समान,अपने कपड़े वापस ले जाओ। इस जुलूस को शांत कराने के लिए अंग्रेजों ने दो-तीन लोगों को गोलियां मार दी।


जिससे आक्रोश में आकर लोग वहाँ के थाने में आग लगा दी। जिससे 22 पुलिसकर्मियों की मौत हो गई। इस घटना के पश्चात गांधीजी ने अपना असहयोग आंदोलन ये कहकर वापस ले लिया कि अभी हमारा देश स्वतंत्रता के लिए पुरी तरह से तैयार नहीं है।


गांधीजी के असहयोग आंदोलन को आंदोलन को रद कर देने के कारण भगत सिंह के मन में गांधीजी के प्रति रोष उतपन्न हो गया। इसके बाद उन्होंने निश्चय कर लिया कि अहिंसात्मक क्रांति की जगह हिंसात्मक क्रांति से अंग्रेजों को सबक सिखाएंगे। अब हम लड़कर के आजादी की लड़ाई लड़ेंगे।


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1924 में जब भगत सिंह 17 साल के थे तब उनके मां ने उनकी शादी की तैयारी कर दी। भगत सिंह ने क्या खूब जवाब दिया “माँ दुल्हन मेरी दुल्हन नहीं होगी, आजादी ही मेरी दुल्हन होगी।”रातों-रात भगत सिंह ये चिट्ठी लिखकर भाग गए। मां रोती रही।


हम पूछना चाहते हैं आखिर ऐसा क्यों होता है कि भगत सिंह की जब बात हो तो हम चाहते हैं कि भगत सिंह पड़ोसी के घर पैदा हो अपने घर नहीं।


भगत सिंह ने घर छोड़कर आगे की रणनीति बनाने लगे। इसी बीच काकोरी कांड में 9 अगस्त 1925 को ब्रिटिश सरकार के विरुद्ध भयंकर युद्ध छेड़ने के इरादे से हथियार खरीदने के लिए अंग्रेजी खजाने को लूट लिया। क्योंकि उस समय पैसे की जरूरत थी। जिसमें ये लोग पकड़े गए। इनके दोस्त असफाकउल्लाह खान और रामप्रसाद बिस्मिल दोनों को फांसी हो गयी।


इस बात से भगत सिंह बहुत क्रोधित हुए और उनको रामप्रसाद बिस्मिल की एक बात याद आ गयी “सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है देखना है जोर कितना तेरी बाजुएं कातिल में है।” इस घटना के बाद भगत सिंह पूरे जोश से अंग्रेजों के खिलाफ अभियान में जुट गए।


भगत सिंह दशहरा मैदान में चले गए क्योंकि वहाँ भीड़ इकट्ठा थी। वहाँ जाकर उन्होंने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लोगों को पर्चे बांटने लगें और लोगो को अपने साथ करने लगे। वहां वे पकड़े गए वो बम फोड़कर भागने लगे लेकिन पकड़े गए। अंग्रेजी हुकुमत चाहती थी कि इनको छोड़ना नहीं है।


लोग भगत सिंह को छुड़ाने के लिए गए कोर्ट ने उस समय 60 हजार रुपये की मांग की। कितने लोगों ने अपने खेत-ज्यादाद बेच कर इनको बाहर कराए। फिर भगत सिंह आगे की तैयारी में लग गए। 1928 में जब भगत सिंह 20 साल के थे तो लाला लाजपतराय  जो इनके गुरु थे लेकिन विचारधारा में बिल्कुल अलग थे। वे नरम दल के थे और भगत सिंह गरम दल के।


उन्होंने भगत सिंह को साइमन कमीशन के खिलाफ इनको अपने साथ कर लिए। और लाहौर में 30 अक्टूबर 1928 को इन्होंने विशाल प्रदर्शन में हिस्सा लिया। और साइमन कमीशन के खिलाफ नारेबाजी करने लगे। ‘साइमन कमीशन वापस जाओ, वापस जाओ।’


अंग्रेजों ने वहाँ लाला लाजपतराय पर इतनी लाठियां बरसा दी कि अस्पताल में इलाज के दौरान 17 नवंबर 1928 को इनकी मृत्यु हो गयी। जिससे पूरा देश गम में डूब गया। वो बोले थे कि मेरी मौत ब्रिटिश सरकार की ताबूत पर आखिरी किल साबित होगी। भगत सिंह, राजगुरु, चंद्रशेखर आजाद इनकी मौत से बहुत आहत हुए। वे तय किये की हम इसका बदला जरूर लेंगे।


भगत सिंह और उनके कुछ दोस्तों ने अंग्रेजी सरकार को सबक सिखाने के लिए पुलिस अधीक्षक स्कॉट  को मारने की योजना बनाई। 17 दिसंबर 1928 को लाहौर कोतवाली पर भगत सिंह, राजगुरु, चंद्रशेखर आजाद तैनात हो गए। उन्होंने स्कॉट की जगह उप-पुलिस अधीक्षक सॉन्डर्स को ही गोली मार कर हत्या कर दिया। और वहाँ से भाग गये।


अगले दिन भगत सिंह पर्चे लेकर लाल स्याही से ये लिखकर लाहौर के दिवालों पर चिपका डाला “हमने लाला लाजपतराय की मौत का बदला सॉन्डर्स को मार कर ले लिया।” ये ब्रिटिश हुकुमत के मुंह पर बहुत बड़ा तमाचा था। उन्होंने भगत सिंह को पकड़ने के लिए हर जगह खोजबीन शुरू कर दिया। अंग्रेज भगत सिंह को किसी भी हाल में पकड़ना चाहते थे।


भगत सिंह ने लाहौर से निकलने की योजना बनाई। इन्होंने और राजगुरु उस समय भगवती चरण वोहरा की पत्नी दुर्गा भाभी के पास गए और उनको अपनी पत्नी का रोल थोड़ी देर निभाने के लिए मना लिया।


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भगत सिंह ने अपना पोशाक बदला, मूंछ दाढ़ी काटी और पगड़ी हटाकर टोपी पहनकर अपना पुरा रूप बदला और अंग्रेजों की तरह रेलवे स्टेशन पर पहुंचे और राजगुरु को अपना नौकर बनाया। इस तरह लाहौर से निकल गए उधर अंग्रेजी सरकार भगत सिंह को खोजती रही।


इधर भगत सिंह ने ट्रेन पकड़ी और भटिंडा के रास्ते कोलकता पहुंच गए। ब्रिटिश सरकार की मजदूर विरोधी नीतियों से ये बहुत दुखी थी। उसके खिलाफ ये आवाज उठा रहे थे पर ब्रिटिश सरकार सुन नहीं रही थी।


भगत सिंह को फांसी क्यों दी गई | Bhagat Singh In Hindi Essay


उन्होंने बटुकेश्वर दत्त को अपने साथ लिया और ढ़ेर सारे पर्चे लिखे। वे अचानक 8 अप्रैल 1929 को दिल्ली की सेंट्रल असेम्बली पहुंच गए। बिना किसी के नुकसान पहुंचाने के लिए वे एक खाली जगह पर बम फेके। वहाँ उनका मकसद किसी की जान लेना नहीं था। पूरा असेम्बली धुंआ से भर गया वे हवा में पर्चे हवा में उछालने लगे।


उस हर पर्चे पर लिखा था ‘बहरों को सुनाने के लिए धमाका जरूरी है।’ वे चाहते तो वहाँ से भाग कर निकल सकते थे लेकिन जानबूझकर कर वहाँ नारे लगाने लगे- ‘इंकलाब जिंदाबाद,इंकलाब जिंदाबाद’ और खुद को पकड़वा दिया।


भगत सिंह एक ऐसे लड़के थे जो अपनी मौत को भी यादगार बनाना चाहते थे। वो चाहते थे कि ब्रिटिश शासन उनको पकड़ ले, उनको गोली मार दे क्योंकि कहीं अंग्रेजी सरकार के खिलाफ आजादी की लड़ाई ठंडी न पड़ जाये।


गिरफ्तार होने के बाद भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को जिस जेल में रखा गया। वहां उन्होंने देखा कि भारतीय कैदियों और अंग्रेजी कैदियों में काफी भेदभाव हो रहा था। भारतीय कैदियों को न तो खाने की अच्छी व्यवस्था थी और न रहने की ही कोई व्यवस्था थी एक छोटे कमरे में दस-दस कैदियों को रखा गया था।


जबकि उसी जेल में अंग्रेजी कैदियों को ये सब कुछ मौजूद था। भगत सिंह जेल के अंदर भी आंदोलन शुरू कर दिया। वहाँ भी इन्होंने अंग्रेजों के नाकों चने चबाने को मजबूर कर दिए। अंग्रेजी सरकार घबरा कर उनको लाहौर जेल में शिफ्ट कर दिया।


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भगत सिंह ने ये सब देख कर निर्णय कर लिया की जब तक उनको अंग्रेजी कैदियों जितना सुविधा नहीं मिलता वे 64 दिन तक खाना नहीं खायेंगे। जून 1929 से भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त, राजगुरु, सुखदेव और उनके अन्य साथी भी भूख हड़ताल शुरू कर दिए। इनके साथ साथ सारे कैदी भी इनके साथ इस आंदोलन में शामिल हो गए।


उनके भूख हड़ताल को तुड़वाने के लिए अंग्रेजो ने उनको ढेर सारी यातनाएं दी। उनको बर्फ की सिलियों पर लेटा कर कोड़ो से मारा जाता था जबर्दस्ती खाना खिलाया जाता था। लेकिन भगत सिंह ने हार नहीं मानी और अन्न का एक टुकड़ा भी इस दौरान नहीं खाया।


13 सिंतबर 1929 को भूख हड़ताल से इनके साथी यतीन्द्र दास की कमजोरी की वजह से मृत्यु हो गयी। भगत सिंह का भी वजन घटते जा रहा था। लेकिन फिर भी भगत सिंह के चेहरे पर हमेशा मुसकान रहती थी। वे नारे लगाते रहते थे ‘इंकलाब जिंदाबाद।‘ सारे अंग्रेज घबरा गए बोले कैसा आदमी है।


भगत सिंह कहते थे-“मेरे सीने में जो जख्म है वो तो फूल के गुच्छे हैं। हमें पागल रहने दो हम पागल ही अच्छे हैं।” इनके आगे अंग्रेजों को घुटने टेकने पड़े और इनकी बात को माननी पड़ी।


भगत सिंह जेल में भी लिखते और पढ़ते रहते थे। वे लोगों से कहते थे अगर कोई मुझसे मिलने आएगा तो किताबें और कागजे जरूर लेकर आएगा। कहते हैं जेल में उन्होंने इस दौरान 3000 से ज्यादा पन्ने लिख डाले। उनमें से कुछ पन्ने आज भी है और कुछ नहीं है।

 

लोग इनको नास्तिक कहते थे पर ये अपने पास स्वामी विवेकानंद का चित्र और गीता की छोटी बुक हमेशा रखते थे। इनके पढ़ने की दीवानगी को देखकर अंग्रेज भी परेशान रहते थे।


दोस्ती कार्ल मार्क्स और लेनिन से भगत सिंह बहुत प्रभावित थे। 26 अगस्त 1930 को अदालत ने भगत सिंह को भारतीय दंड संहिता की धारा 129,302 तथा विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा 4 और 6f एवं आइपीसी की धारा 120 के अंतर्गत अपराधी घोषित किया।


7 अक्टूबर 1930 को अदालत द्वारा 68 पृष्ठों के आधार ओर ये निर्णय लिया गया, जिसमें भगत सिंह,राजगुरु और सुखदेव को फांसी की सजा तथा अन्य सभी साथियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।


ये बोलते थे कि मैं एक ऐसा पागल हुँ जो जेल में भी आजाद हूँ। जब इनसे पूछा गया कि तुम्हारी आखिरी इच्छा क्या है ? ये कहते हैं कि मैं लेनिन की पूरी बायोग्राफी पढ़ना चाहता हूँ। जब इनको फांसी के लिए बुलाया जाने लगा तो बोले ‘ठहरो अभी देखते नहीं एक क्रांतिकारी दूसरे क्रांतिकारी से मिल रहा है।’ और लेनिन के किताब की आखिरी पन्ना पढ़ कर ही उठे।


24 मार्च 1931 को इनकी फांसी की तारीख तय किया गया। जैसे जैसे फांसी के दिन नजदीक आने लगा भगत सिंह और खुश रहने लगे। ब्रिटिश हुकुमत भी इनको देख कर परेशान थी। देश भर फांसी की तारीख फैलने से ब्रिटिश सरकार घबरा गई। वे लोग घबरा गए कहीं ऐसा न हो कि 24 तारीख को यहाँ इतना न भीड़ इकट्ठा हो जाये कि आग ही लगा दी जाए, दंगा हो जाये।


आप जरा सोचिए भगत सिंह से ब्रिटिश हुकुमत इतनी डरी हुई थी कि सबको सुबह फाँसी की सजा दी जाती है। जबकि भगत सिंह को 24 मार्च को सुबह फांसी देने की जगह आनन फानन में 23 मार्च 1931 को रात में ही फांसी देने का निर्णय लिया गया।


फांसी देने के लिए जब बुला लिया गया तो भगत सिंह ने कहा- क्या ऐसा हो सकता है कि मेरा चेहरा न ढंका जाए और मेरे हाथ मत बांधा जाए।


ब्रिटिश सरकार ने हाथ खुले रहने का बात स्वीकार कर लिया। लेकिन कहा चेहरा तो ढकना पड़ेगा। ये खुशी-खुशी फांसी के फंदे को चूम कर जोर-जोर से इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाते हुए फांसी पर लटक गए।


मुझे गर्व है कि मैं उस देश में पैदा हुआ जिस देश में भगत सिंह जैसे अमर शहीद ने जन्म लिया। लेकिन मुझे दुख है कि आज भी कुछ मूर्ख, और बेवकूफ इतिहासकार भगत सिंह को शहीद का दर्जा नहीं देते बल्कि इनको आतंकवादी कहते हैं। दुख होता है मुझे की गाँधी को राष्ट्रपिता माना मुझे कोई तकलीफ नहीं है, पर क्या भगत सिंह को हम राष्ट्रपुत्र की उपाधि दिला सकते हैं।


सारे सांसद, नेताओं और मंत्रियों तक इस पोस्ट को जरूर शेयर कीजिये ताकि हम अपने वीर शहीद भगत सिंह को राष्ट्रपुत्र का दर्जा दिला सके। अपने भगत सिंह को ऑफिसियल शहीद का दर्जा दिला सकें। आज भी अंग्रेजों के किताबों में भगत सिंह को शहीद नहीं माना जाता बल्कि आतंकवादी माना जाता है।


आप सब हमारा साथ दीजिये और इस पोस्ट को सबके पास पहुंचाये,सबकी आवाज बनाये। क्यों न हम मिलकर भगत सिंह को राष्ट्रपुत्र का दर्जा दिला सकें।


आपसे अनुरोध है कि भगत सिंह के इतने बड़े सहादत को ऐसे ही बेकार मत जाने दीजिये। भगत सिंह की जीवनी को शेयर करके इस आवाज को और बुलंद कीजिये। अगर थोड़ा भी आपके मन में देशभक्ति है तो इस पोस्ट को शेयर करना न भूलियेगा।

धन्यवाद।

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